चिट्ठियाँ

By: Kamlesh Manchanda

0
29
Put your rating for this post for encouraging the author

डाकिए का आना

चेहरों पर खुशी छाना

अपनी अपनी चिट्ठी पूछना

और चिट्ठी पढ़ कर

अपने प्यारों को बताना

15 पैसे का पोस्टकार्ड

था बड़ा लाजवाब

मन मस्तिष्क से अपनों

तक पहुंचाता था

पुरानी यादों के किस्से

खुलवाता था

कभी दादी अलमारी से

चिट्ठी निकाल सारे

रिश्ते गिनवाती थी

कभी खुशी कभी गम में नहाती थी

वो चिट्ठियाँ जाने कहाँ खो गई

जिसमें लिखने के सलीके छुपे होते थे

अक्सर,

प्रणाम…

हम ठीक हैं . . .

आपकी कुशलता की कामना

से शुरू होते थे और

बड़ों के चरणस्पर्श पर

खत्म होते थे

और बीच में लिखी होती थी

ज़िंदगी, विछोह, विवशताएं,

मौसम, सुख दुख,

नन्हे के आने की खबर

माँ की तबीयत का दर्द

और पैसे भेजने का अनुनय

फसलों के खराब होने की वजह

कितना कुछ सिमट जाता था

एक नीले से कागज में,

जिसे कोई भाग कर सीने से लगाती

और अकेले में आँखों से आँसू बहाती

माँ की आस थी ये चिट्ठियाँ

पिता का संबल थी ये चिट्ठियाँ

बच्चों का भविष्य थी ये चिट्ठियाँ

और गाँव का गौरव थी ये चिट्ठियाँ

अब सब बदल गया है

चिट्ठी का कोई नहीं मोल

सेकंड में पहुँच जाती है मेल

न दिल धड़कता है

न प्यार उमड़ता है

न भूली बिसरी यादें

ताज़ा होती हैं

अब तो स्क्रीन पर अंगूठा दौड़ता है

और अक्सर ही दिल तोड़ता है

मोबाईल का स्पेस भर जाए तो

सब कुछ पल में डिलीट होता है

सब कुछ सिमट गया

चंद इंचों की स्क्रीन में

जैसे मकान सिमट गए फ्लैटों में

जज़्बात सिमट गए मैसेजों में

चूल्हे सिमट गए गैसों में

और इंसान सिमट गए पैसों में

By: Kamlesh Manchanda

Write and Win: Participate in Creative writing Contest & International Essay Contest and win fabulous prizes.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here