आमूमन तौर पर कहा जाता है कि हर चीज़ के फ़ायदे और नुकसान होते हैं लेकिन सोचने के नुकसान, ऐसा कैसे हो सकता है? हो सकता है, बिल्कुल हो सकता है। देखिए, ज़रूरत से ज़्यादा तो कहते हैं कि किसी से प्यार, लगाव, खाना, और गुस्सा भी नुकसानदायक है, तो फिर सोच कहाँ बच सकती है। ज़रूरत से ज़्यादा सोचना भी घातक साबित हो सकता है। यह सिर्फ कहने भर की बात नहीं है। अक्सर यह ज़रूरत से ज़्यादा सोचने की आदत लोगों को उन्ही की सोच के एक ऐसे चंगुल में फँसा लेती है जिससे निकलते-निकलते लोगों की ज़िंदगी के वह साल, जो सबसे खूबसूरत और सबसे बेहतरीन हो सकते थे वह बर्बाद हो जाते हैं। बहरहाल, यह बातें तो इस तरफ़ इशारा करती हैं कि ज़रूरत से ज़्यादा सोचना ही नहीं चाहिए लेकिन ऐसा नहीं है। कई दफ़ा ऐसा भी होता है कि यह ज़रूरत से ज़्यादा सोचने की आदत आपको रोज़गार और मुनाफ़ा भी दे जाती है। अगर आप सोच रहे हैं कि कैसे तो आईए देखते हैं। लेकिन हाँ! इस बार आपको कुछ अलग देखने को मिलेगा। यहाँ हम पहले बात करेंगे कि ज़रूरत से ज़्यादा सोचने के क्या नुकसान हैं, क्यों? क्योंकि हर किसी के पास कम – से – कम एक तो ऐसा कारण होता है कि ज़रूरत से ज़्यादा क्यों नहीं सोचना चाहिए और फिर बात होगी कि इसके क्या फ़ायदे हैं? आईए जानते हैं।
ज़रूरत से ज़्यादा सोचने (ओवरथिंकिंग) के नुकसान
देखिए हम इस बारे में थोड़ा तो जान चुके हैं कि ज़रूरत से ज़्यादा सोचने, यानि ओवरथिंकिंग, की आदत खराब है। लोग इसे अक्सर बीमारी कहते है और यह बात सही भी है की ज़रूरत से ज़्यादा सोचना इंसान को एक ऐसी मानसिक पीढ़ा का मरीज़ बना देता है जो फिर कहीं का नहीं छोड़ता। लोगों से मेल – जोल कम होने लगता है। दुनिया सिर्फ अपने आस – पास ही सिमटी हुई दिखाई देती है। आगे कुछ नज़र ही नहीं आता। आईए देखते हैं तब क्या हो जाता है जब सोच से परे की दुनिया धुंधली नज़र आती है।
मानसिक तनाव का बढ़ना
अब अगर गौर किया जाए तो सोच की उपज दिमाग से ही होती है तो ज़ाहिर है कि सारा बोझ भी वहीं जाएगा और इसके परिणामस्वरूप मिलता है मानसिक तनाव। यह मानसिक तनाव ऐसा महसूस होता है जैसे किसी ने सर के ऊपर न जाने कितने किलो का भार रख दिया हो। इस भार के साथ दुनिया का मुक़ाबला करना बड़ा ही मुश्किल हो जाता है। सोचते – सोचते इंसान अपने आप में ही इतना ज़्यादा उलझ जाता है कि कोई भी फैसला लेने की हिम्मत नहीं होती। ऐसा नहीं है की फैसला लेना नहीं आता बल्कि एक फैसला जो कुछ मिनटों में लिया जा सकता था, उसे ज़रूरत से ज़्यादा सोचने की वजह से घंटों तक टाला जाता है जिससे काम खराब होने लगते हैं।
सोच के पिंजरे में सपने क़ैद
सपने पूरे करने का जज़्बा ही तो इंसान को ज़िंदगी जीने और जिंदा रहने की उम्मीद देता है लेकिन तब क्या हो जब यह सपने आपकी सोच के पिंजरे में क़ैद हो कर ही मर जाएँ। यह ज़रूरत से ज़्यादा सोचने की आदत सपनों को सोच तक ही सीमित कर देती है और कर्म करने से रोक देती है। जब तक कर्म नहीं होता, तब तक सपने, सपने ही रहते हैं। ज़रूरत से ज़्यादा सोचिए और अपने सपनों को मार दीजिए, यह करना तो बेहद आसान है। मुश्किल है तो बिना सोच को क़ैद किए, कर्म करना और बेझिझक सपनों को पूरे करना।
डर का मंडराता साया
जब आप ज़रूरत से ज़्यादा सोचते चले जाते हैं तब अलग – अलग तरीके के डर के बादल सर के ऊपर उमड़ते –
घुमड़ते रहते हैं। इसी ज़्यादा सोचने की वजह से इंसान उन सब चीजों और घटनाओ की कलपना करने लग जाता है जो अभी तक उसके साथ घाटी भी नहीं है। यही डर लगता रहता है कि हाय यह मैंने क्या कर दिया, उसने मेरे साथ ऐसा क्यों किया, मैंने तो कुछ गलती नहीं कर दी, हो न हो इन सब में मेरी ही गलती होगी, तभी तो उसने ऐसा किया,
अगर मैं उससे यह पूछता हूँ तो उसको बुरा तो नहीं लगेगा। यही सब ख्याल मिल – जुल के आदमी को जकड़ लेते हैं और डर के आगे वह किसी से कुछ कहने की हिम्मत भी नहीं कर पाता। वह बातें जो अच्छे – भले लोग हँस – खेल के कह देते हैं, वही बातें यह लोग बड़े लंबे अरसे तक अपने दिल में दबाए रखते हैं।
आत्मविश्वास की कमी
आत्मविश्वास भी डर के पहलू से जुड़ा है। अभी हमने बात की कि किस तरह डर का साया इंसान के सपनों को डस जाता है। जहां आत्मविश्वास होता है वहाँ डर के लिए कोई जगह ही नहीं बचती। लेकिन चूंकि ज़रूरत से ज़्यादा सोचने में हम अपनी नकली दुनिया में इतना धंस चुके होते हैं कि आत्मविश्वास तो दूर – दूर तक दिखाई नहीं देता। आत्मविश्वास का असल मतलब है खुद को समझना और यह जानना कि दुनिया की कितनी भी मुसीबतें क्यों न आ जाएँ, मैं हर एक चुनौती से लड़ने की काबिलियत रखता हूँ और जो भी हो, मैं उससे जीत कर बाहर निकल सकता या सकती हूँ।
ज़रूरत से ज़्यादा सोचने (ओवरथिंकिंग) के फ़ायदे
चलिए अब यह तो रही ज़रूरत से ज़्यादा सोचने यानि ओवरथिंकिंग के नुकसानों की बात लेकिन क्या आपको मालूम है की इसके फायदे भी हैं। माना के ज़रूरत से ज़्यादा सोचना परेशान करता है, बीमारियों को न्योता देता है लेकिन जिस तरह हर सिक्के के दो पहलू होते हैं तो यह कहना बिल्कुल भी गलत नहीं होगा की ज़रूरत से ज़्यादा सोचना भी फायदेमंद साबित हो सकता है। इतना ही नहीं अगर इसे सही दिशा में लगाया जाए तो फ़ायदे इतने होंगे की नुकसान के बारे में भी सोचने की ज़रूरत नहीं होगी। कैसे? आईए, जानते हैं।
गहन सोच की क्षमता बढ़ना
देखिए जब भी आप ज़रूरत से ज़्यादा सोचते हैं, इसका मतलब है कि आप सोचते चले जा रहे हैं। इतना गहन चिंतन करने के बाद जो गिरहें उलझी हुई लग रही थी वह सुलझती हुई दिखाई देती हैं। आम आदमी जितना सोच पाता है, उससे आगे से तो गहरा सोचने वालों के ख्याल शुरू होते हैं। सोच में यह गहराई की वजह से काफ़ी दूर तक साफ़ दिखाई देता है और गहराई से सोचने की क्षमता बढ़ती है।
गलतियों की संभावना का कम होना
अब यह तो देखिए साफ़ सी बात है कि अगर आप गहराई से सोचते हैं तो गलतियाँ होने की संभावना लगभग खत्म हो जाती है। ऐसा इसलिए क्योंकि आप ज़्यादा सोचने की वजह से वह सारे पैमाने माप लेते हैं जहाँ गलतियाँ हो सकती हैं तो इसका मतलब यह हुआ कि आपने आधे से कई ज़्यादा प्रतिशत तो गलतियाँ कम कर ही दी तो वहाँ पर गलतियाँ निकलने की संभावना तो न के बराबर है। यह न सिर्फ आपके काम की जगह पर आपकी मदद करता है बल्कि आपकी ज़िंदगी में भी गलतियाँ काफ़ी निचले स्तर पर ले आता है।
रचनात्मकता में बढ़ोतरी
रचनात्मकता का अर्थ है अपनी कलपना से किसी नई चीज़ की उपज करना जो एकदम अलग हो। असल में आप कितना अच्छा, गहरा और साफ़ सोच पाते हैं वही यह निर्धारित करता है कि आप कितनी सटीक कलपना कर पाएंगे। जितनी बढ़िया आपकी कलपना होगी, उतनी ही निखरी हुई आपकी रचनात्मकता होगी। जितनी ज़बरदस्त रचनात्मकता उतने ही ज़्यादा आगे बढ़ने के रास्ते होने वाले हैं। रचनात्मकता, कलपना की उपज है और और यह कल्पना, साफ़ सोच और गहन चिंतन से आती है।
मुनाफ़ा कमाना
अब आते हैं उस बात पर जिसका राज़ हम ने शुरुआत से कायम रखा है। देखिए अगर ओवरथिंक करना ही है तो क्यों न उससे पैसे कमाए जाएँ। जी हाँ! आप ऐसे कामों में अपना दिमाग क्यों नहीं लगाते जहाँ ज़रूरत से ज़्यादा सोचने की कीमत मिलती है। एक है, उपयोगकर्ता अनुभव डिजाइनर, अंग्रेजी में जिसे ux designer भी कहते हैं। इस काम में आपको वह तरीके सोचने के पैसे मिलते हैं कि जो इंसान आपकी एप का इस्तेमाल करेगा वह किस – किस तरीके से सोच सकता है, वह आपकी एप को कैसे आसानी से इस्तेमाल करेगा, अगर उसे आपकी एप जो खाने की है वहाँ से खाना लेना है तो वह कैसे उसे आसानी से कर सकता है।
निष्कर्ष
जब आपको ज़रूरत से ज़्यादा सोचने के पैसे मिल रहे हैं तो फालतू में क्यों सोच कर अपनी तबियत को खराब करना। ज़रूरत से ज़्यादा अपने आप को हलकान करने के लिए मत सोचिए बल्कि खुद का विश्लेषण, खुद को आगे बढ़ाने और आगे का रास्ता साफ़ – साफ़ देखने के लिए सोचिए। किसी भी चीज़ को अगर सही दिशा दे डी जाए तो करिश्मा होन फिर तय है, बशर्ते आपके नज़रिये और आपकी सोच में ताल – मेल हो। कई मुद्दे ऐसे होते हैं जो ज़रूरत से ज़्यादा सोच की मांग करते हैं वहाँ वो वक्त, अपनी ताकत और सोच दीजिए लेकिन जिन बातों से दर्द, परेशानी, और मन भारी हो तब उसे वहीं छोड़ दीजिए। लेकिन हाँ, जो सोच इंसान को खुश करे उसे वह ज़रूर सोचनी चाहिए।
अब यह आपके ऊपर है कि आप अपनी सोच के पहिए को कौनसी दिशा देना चाहते हैं? बाज़ी अब आपके हाथ में है, चाहे तो इसे ऐसे ही रखे या तो इसे पूरे तरीके से ही पलट दें। अब फ़ैसला आपके हाथ में है।
By:
| Lavanya Madan |
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