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टी वी पर कलर्स चैनल द्वारा प्रसारित किया जाने वाला शो ‘बालिका वधू’ अब तक का अत्यधिक प्रसिद्ध टी वी शो माना जाता है। इसमें व्यवहारिक रूप में दर्शाया गया है कि किसी बालिका अर्थात अबोध बच्ची अथवा अवयस्क बच्ची को समय से पहले शादी के बंधन में बांधने से केवल उसका बचपन ही नहीं, पूरी ज़िंदगी ही दांव पर लग जाती है। शायद तभी इसे ‘कच्ची उम्र के पक्के रिश्ते’ भी नाम दिया गया। क्योंकि शादी से बनने वाला रिश्ता तो पूरी ज़िंदगी का पक्का रिश्ता बन जाता है। एक बच्ची को पढ़ लिख कर अपना जीवन, अपना कैरियर बनाने के लिए तत्पर व प्रेरित न करके उससे उसका बचपन भी छीन लिया जाता है। उसके खेलने कूदने के दिनों में उस पर गृहस्थ की जिम्मेदारियों का बोझ लाद दिया जाता है, जिनका शायद वह उस समय तक मतलब भी नहीं जानती। 

इस शो में आठ साल की कच्ची उम्र में एक बालिका ‘आनंदी’ वधू बनने पर एक ऐसी नई दुनिया में प्रवेश करती है जो भ्रामक ही नहीं अपितु दुतकार से भरी हुई थी। बचपन में खेलने कूदने का आनंद, पढ़ने का शौक, माता पिता का लाड प्यार, सहेलियों के साथ मौज मस्ती व ठिठोलियाँ आदि आदि सबका गला घोंट दिया गया। बेफिक्री भरे जीवन से वंचित कर नादान ‘आनंदी’ को एक अवयस्क एवं विद्यार्थी की बहू बना दिया गया और अपने परिवार से बहुत दूर एक अजनबी परिवार के अनुसार स्वयं को ढालने के लिए छोड़ दिया गया। जबकि उस उम्र में वह पत्नी अथवा बहू के कर्तव्य व अधिकार तो दूर, इन शब्दों के मायने भी ठीक से नहीं जानती थी। लेकिन उसे इन भूमिकायों को निभाने के लिए मजबूर कर दिया गया। ऐसी प्रथाओं को व्यवहारिक रूप में देखने से ही मन में ग्लानि का अनुभव होने लगता है।  

‘दादीसा’ पारंपरिक भारतीय परिवार की माँ, सास और कुलमाता, पुराने ख्यालों की अनपढ़ औरत है, जिसका रोब घर में चलता है। एक भयानक सच यह भी दर्शाया गया कि कैसे अपने विधुर या अधेड़ उम्र के बेटे का भी नाबालिग बच्ची  से जबरदस्ती केवल बल व पैसे के दम पर विवाह करवा दिया जाता है, और नाबालिग बच्ची के माता पिता को चुप रह कर सब सहना पड़ता है। उनके बेटे और बहूएं, जो इन प्रथाओं के दुष्परिणामों को समझते हैं, वे भी चाहते हुए भी उन्हे ऐसा करने से रोक नहीं सकते। इसे हम शायद आदर्शों का पालन अर्थात बड़ों का आदर करना और उनकी आज्ञा का उल्लंघन न करना कह सकते हैं।

इस शो की विशेषता यह थी कि इस शो में विभिन्न सामाजिक बुराइयों का हर कदम पर होने वाला दुष्परिणाम व्यवहारिक एवं प्रत्यक्ष रूप में दिखाया गया है। ऐसे करुणामयी व दुखांत दृश्य देखने से ही इंसान का दिल दहल जाता है। फिर भी अफसोस की बात यह है कि ऐसी सामाजिक बुराइयां स्वतंत्रता के 73 वर्षों के पश्चात भी जीवंत हैं और अपना प्रभाव जमाए हुए हैं। अर्थात हम आज भी पूर्ण रूप से स्वतंत्र नहीं हैं। इन बुराइयों के दुष्प्रभावों को जानते हुए भी लोग अपने बच्चों के जीवन से खिलवाड़ करने से नहीं चूकते। आज भी कितने ही ऐसे परिवार हैं, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में, जो बाल विवाह को ही प्राथमिकता देते हैं। वस्तुत: इससे केवल वधू के रूप में परिणित एक बालिका ही नहीं, उसका समस्त परिवार संघर्षों से जूझता है। अवयस्क बालक अर्थात वर एवं उसके परिवार को भी कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है।  

सारांश में कह सकते हैं कि इस टी वी शो के माध्यम से देश में सदियों से चली आ रही बाल विवाह, बालिकाओं को शिक्षित न करना, उन्हें पूर्ण रूप से पोषण सुविधाएं न देना, बालिकाओं को समान अधिकार न देना, महिला भ्रूण हत्या और सती प्रथा जैसी कुप्रथाओं को रोकने के लिए सामाजिक मुद्दे उठाए गए थे ताकि जनमानस इनके दुष्परिणामों को देख कर ही अपने परिवार व समाज को इन कुरीतियों से मुक्ति दिलवाएं। ऐसी कुप्रथाओं से पूर्ण रूप से छुटकारा पा लेने पर ही देशवासी अपने रहन सहन के स्तर को सुधार पाने में सक्षम हो सकते हैं। ये सामाजिक एवं सामूहिक मुद्दे हैं, जिसका हल कोई एक या दो व्यक्ति नहीं कर सकते, बल्कि पूरे समाज व राष्ट्र के लोगों को मिल कर इनके खिलाफ आवाज उठानी होगी और ऐसे घृणित कार्यों को होने से रोकना होगा। 

इस शो के द्वारा 2000 से अधिक एपिसोड पूरे करने पर सबसे लंबे समय तक चलने वाले धारावाहिक के रूप में ‘लिमका बुक ऑफ रिकार्ड’ में भी नाम दर्ज कराया गया है। इस शो को दर्शकों का भरपूर प्यार मिला, तभी तो यह इतने सालों तक सफलतापूर्वक चलने में कामयाब रहा।

कमलेश मनचन्दा, गुड़गाँव

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