व्यायाम – स्वस्थ जीवन का आधार

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स्वास्थ्य ही मानव जीवन की सबसे बड़ी धरोहर      है। हमारे ऋषियोँ ने कहा था ‘जीवेम शरदा शतम्’। अर्थात् हम सौ वर्ष तक जीवित रहें। किंतु उन्होंने यह कामना की थी की हम हँसते, खेलते हुए जीवन के हर पड़ाव को सुगमता से पार कर सकें, पर यह तभी संभव है जब हमारा शरीर स्वस्थ और निरोगी रहेगा।

स्वास्थ्य :जीवन की आधारशिला : 

हमारा जीवन शरीर पर ही निर्भर है । शरीर नहीं तो जीवन नहीं,अर्थात शारीरिक स्वास्थ्य ही हमारे संपूर्ण जीवन की आधारशिला है, नीव की ईट के सामान है,जिसके थोडा सा भी अस्तव्यस्त होने से शरीर रूपी भवन धराशायी हो जायेगा, और हमारा शरीर अनेक प्रकार के रोगों से ग्रस्त हो जायेगा। इसलिये प्राचीन काल से लेकर अब तक देश और विदेश के हर कोने में स्वास्थ्य की उपयोगिता पर बल दिया जाता रहा हैं, क्योंकि वास्तविकता तो यही है कि यदि शरीर स्वस्थ न होगा ,तो जीवन के कोई भी काम सहजता से सम्पन्न नहीं होंगे। इसलिए कहा गया है की ‘जान है तो जहान है’। इसलिये मन को प्रफुल्लित और तन को शसक्त बनाने के लिए व्यायाम का अति महत्व है। इसलिए हमें अपनी शारीरिक अवस्था को दृष्टीगत रखते हुए विभिन्न प्रकार की शारीरिक क्रियाएँ जैसे खेलना,कूदना,टहलना और शरीर संतुलन संबंधी योगदान ही ऐसे कार्य हैं, जिससे हमारा शरीर स्वस्थ और सुडौल होता है।

व्यायाम का लक्ष्य हमारी शारीरिक और मानसिक शक्ति का विकास करना है।

व्यायाम के विभिन्न रूप- शारीरिक स्थिति को दृष्टीगत रखते हुए व्यायाम को 2 वर्गों में विभाजित किया गया है।

1• मानसिक व्यायाम – मन की शक्ति का विकास करने वाले कार्य को मानसिक व्यायाम कहा जाता है। सर्वप्रथम प्राणायाम करने से हमारा मन एकाग्रचित और प्रसन्न रहता है, जिससे हम हर कार्य संलग्नता और निपुणता के साथ सम्पन्न करते हुए अपने आस-पास के वातावरण को भी खुसनुमा बना सकते हैं, इसके विपरीत संगीत थेरेपी भी हमारे मानसिक अवसाद को दूर करने में अतीव कारगर है, क्योंकि संगीत सुनने से हमारे मस्तिस्क की विद्युत तरंगे प्रभावित होती है,जिससे आनंद की अनभूति होती है, और हम हर कार्य को सुगमता से संभव करकें अपने परिवार और समाज को खुशियां दे सकते है,क्योंकि एक प्रसन्न मन ही दुसरो को खुशियां दे सकता है। बड़े से बड़े मानसिक रोगों को दूर करने में संगीत थेरेपी कारगर सिद्ध हुई है,इसलिए हमें इस थेरेपी को स्वयं ही नहीं अपितु  दूसरों को भी अपनाने के लिए ज्यादा से ज्यादा प्रेरित करना चाहिए, क्योंकि स्वस्थ-परिवार और स्वास्थ्य समाज के सहयोग से देश की प्रगति संभव है।

2• शारीरिक व्यायाम – शारीरिक बल को बढ़ाने वाले व्यायाम को  शारीरिक व्यायाम कहते हैं। इसमे मन की स्फूर्ति के माध्यम से मानसिक शक्ति बढ़ाने की क्षमता भी होती है, प्रधानता ये व्यायाम शरीर को सुडौल और हमें स्वस्थ जीवन का वरदान देते हैं।

शारीरिक व्यायाम को भी 2 वर्गों में विभाजित किया जा सकता हैं- खेलकूद और नियमित व्यायाम। बच्चों और बड़ों के खेलकूद जैसे- कूदना,दौड़ना,कबड्डी, खो-खो,तैरना आदि व्यायाम के विविध प्रकार हैं। इनसे शरीर में रक्त संचार की तीव्रता बढ़ जाती है।अधिक ऑक्सीजन जाने से प्राण शक्ति बढ़ती है और शरीर स्वस्थ्य और निरोगी रहता हैं। इसके विपरीत प्राचीन काल में घरेलू जीवन व्यतीत करने वाली स्त्रियों के लिए हमारे यहाँ चक्की का विधान था। निश्चय ही यह स्त्रियों के स्वस्थ जीवन के लिए सर्वोत्तम व्यायाम था,जिससे स्त्रियां स्वस्थ और  दीर्घायु जीवन व्यतीत करती थी,और पुरूष भी कृषि कार्यों में व्यस्त रहकर स्वस्थ और निरोग्य जीवन व्यतीत करते थे,परंतु आधुनिक युग बिल्कुल इसके विपरीत है, शारीरिक श्रम के अभाव के कारण हर वर्ग विभिन्न प्रकार के जटिल रोगों और मानसिक अवसाद से ग्रस्त हैं। इनसे बचाव के लिए हमें विभिन्न प्रकार के शारीरिक,मानसिक व्यायामो और योग क्रियाओं का दैनिक अनुसरण करना अति महत्वपूर्ण है, जिसके द्वारा हम स्वयं स्वस्थ रहकर एक स्वस्थ समाज का निर्माण करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। प्रमुख़ व्यायाम कुछ इस प्रकार हैं–

 ● प्रातकाल खुली हवा में घूमना।

 ● दौड़ना

 ● कूदना

 ● तैरना

 ● कबड्डी,क्रिकेट और बैडमिंटन खेलना ।

 ● दंड बैठक लगाना।

 ● बॉक्सिंग करना।

 ● कुश्ती करना।

 ● साइकिलिंग करना।

 ● शरीर संतुलन संबंधी योगदान करना।

 ● व्यायाम का नियमित अभ्यास करना।

 ● योगासन करना।

 ●प्राणायाम करना।

 व्यायाम में सावधानियां – व्यायाम के विभिन्न     रूप प्रत्येक व्यक्ति के लिये प्रत्येक अवस्था में लाभदायक नहीं हो सकते। इसलिए हमें समय,आयु एवं शारीरिक शक्ति के अनुसार ही व्यायाम का रूप अपनाना चाहिए।

  कोई  रोग से उठा व्यक्ति,7-8 वर्ष का बालक,दिन भर पढ़ने-लिखने वाला व्यक्ति या वृद्ध अगर जमकर दंड बैठक लगान लगे तो उसे लाभ के स्थान पर  हानि का सामना करना पड़ेगा। अतः व्यायाम के संबंध में कुछ सावधानियां इस प्रकार हैं–

1- उपयुक्त व्यायाम का चुनाव। 2- इसके बाद उपयुक्त समय 3- व्यायाम की उचित मात्रा आदि निश्चित करना चाहिए। 4- इसके साथ ही ध्यान रखना चाहिये की व्यायाम के समय नाक से ही साँस लें 5- इतना ही व्यायाम करें की अति थकान का अनुभव न हो 6- शुद्ध वायु और प्रकाश वाले स्थान पर ही व्यायाम करें 7- व्यायाम के तुरंत बाद नहाये नहीं 8- थोड़ी देर बाद दूध अदि कोई पौष्टिक पदार्थ अवश्य लें।   9- व्यायाम का अभ्यास थोड़े से आरम्भ कर के धीरे-धीरे अवश्य बढ़ाये।

  व्यायाम का महत्व- व्यायाम का हमारे जीवन में अति महत्वपूर्ण स्थान है। ये हमारे शरीर में रीढ़ की हड्डी की तरह है, जैसे बिना रीढ़ की हड्डी के हम शरीर की परिकल्पना नहीं कर सकते, उसी तरह व्यायाम के बिना हम स्वस्थ शरीर की कामना नहीं कर सकते।  

व्यायाम करने से शरीर में स्वस्थ  रक्त का संचार सुचारू रूप से होता है,पाचन तंत्र ठीक से काम करने लगते हैं,जिससे शरीर का प्रत्येक अंग पुष्ट हो जाता हैं, हम दीर्घ जीवी बनते है, मन में उल्लास और जीवन रसमय हो जाता हैं। खेल-कूद और व्यायाम से हमारे तन और मन दोनों में सहनशक्ति,धैर्य और साहस का विकास होता है।

अतः स्पष्ट है की जीवन का रस स्वास्थ्य में है और स्वास्थ्य का आधार खेलकूद और व्यायाम हैं।

 वास्तविक रूप में व्यायाम और खेलकूद के द्वारा हम आत्ममंथन करके ही शरीर को स्वस्थ एवं खुशहाल बनाने में सक्षम हो सकते हैं, अर्थात खेलकूद और व्यायाम ही हमारे जीवन को सच्चे अर्थो में  स्वस्थ्य और जीने योग्य बनाने का श्रेष्ठ अवलंबन है।

लेखक परिचिति : अनिता शुक्ला ,४५ बर्ष ,कल्याण ,ठाणे ,मुंबई



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